“माय फ्रेंड बुशी “

 “माय फ्रेंड बुशी “

मेरा रोना रुक नहीं रहा था, मेरा प्यारा ‘बुशी’ जिसने मुझे इतना प्यार दिया, न जाने कितनी सीख दीं, आज एक ट्रक के द्वारा कुचले जाने के पश्चात् मुझे छोड़ कर चला गया.

बुशी एक बहुत ही झबरा कुत्ता था और न जाने कहाँ से आ कर मेरे पैरों में आकर लिपट गया, उस समय मैं लगभग 10 वर्षों का रहा होउंगा. माता पिता कुता पालने के अनिच्छुक थे , मेरी कोई भी जिद्द उन को न मना सकी, लेकिन बुशी का प्यार मेरे प्रति कभी कम न हुआ . अपने खाने में से बचा के मैं उसको चुप चाप खाना देता रहा और वो भी चुप-चाप उसे स्वीकारता रहा। मुझे नहीं पता वह कहाँ रहता था पर खाने के समय वो हाजिर हो जाता था। इस बीच ऐसा हुआ कि हमें अपना घर किसी दूसरे मोहल्ले में लेना पडा जो कि वर्तमान घर से कम से कम पांच किलोमीटर दूर रहा होगा। मेरा बुशी के प्रति प्यार और उसकी स्वामिभक्ति देखकर मेरे घरवाले उसे नए घर में साथ ले आये.अब वो हमारे साथ ही रहता था .

एक बार मैं दूध लेने डेरी पर गया तो देखा कि दूध निकलने में अभी देर है , तो दूधवाले का बेटा जो मेरा सहपाठी था, उसके साथ गप्पें मारते मारते, हम दोनों पास के ही किसी दूसरे गाँव में पहुँच गए, तभी पीछे मुड़ कर देखा तो बुशी भी हमारे साथ साथ चल रहा था. गाँव में पहुँचते ही गाँव के सभी कुत्तों ने उसको घेर लिया और मुझे लगा आज बुशी बचेगा नहीं. सारे कुत्तों ने उसे घेर लिया था और मैं कौतुहल वश देख रहा था कि अब आगे क्या होगा? तभी अचानक बुशी ने सभी कुत्तों में जो सबसे तगड़ा कुत्ता था उसकी गर्दन झपट कर पकड़ ली, यह मंजर देख कर सभी कुत्ते काऊं काऊं करते हुए भाग खड़े हुए। इस घटना ने मुझे जीवन की एक बड़ी सीख दी कि सबसे बड़े दुश्मन को पकड़ लो, बाकी सब दुम दबा के भाग जाएंगे .

बुशी के अनेक अविस्मरणीय यादों मे एक यह भी है कि मुझसे एक भयंकर भूल/गुस्ताखी हो गई थी जिसके कारण मेरे एक दोस्त के पिता, जो कि पुलिस मे एक उच्च अधिकारी थे एवं मेरे पिताजी के दोस्त भी थे, के सामने मेरी पेशी हो गई.पूरी बात सुनने के पश्चात उन्हे लगा कि लड़का बहुत बर्बाद हो रहा है, उन्होंने अपने बड़े बेटे को मेरे पिताजी को बुलाने भेजा। यह जान कर मेरी हालत बहुत खराब हो गई और भय से मैं कांपने लगा, तथा ईश्वर से इस संकट से मुक्ति हेतु प्रार्थना करने लगा। तभी थोड़ी देर मे उनका बड़ा बेटा कांपता हुआ आया और कहने लगा कि अंकल घर पर नहीं मिले ।यह सुन कर मेरी जान मे जान आई। तत्पश्चात, मेरे मित्र के पिता ने भी मुझे एक मौका और देते हुए मुझे क्षमा कर दिया। बाद मे पता चला कि जो लड़का मेरे पिताजी को बुलाने गया था, उसके मेरे घर की घंटी  बजाने पर  अचानक से बुशी घर से निकल कर उसके ऊपर झपट पड़ा। वो लड़का अपनी जान बचाकर वहाँ से भाग निकला। बुशी का यह उपकार मैं कभी नहीं भूल सकता। मेरा अनुभव तो यह है कि एक कुत्ते के लिए इंसान जितना कुछ करता है, उसकी वफादारी के आगे कुछ भी नहीं है ।

अलविदा मित्र, जहां रहो खुश रहो!

“भूखा रहा पर साथ नहीं छोड़ा,

कुत्ते जैसी वफ़ा इंसानों मे क्यों नहीं होती।“

-रवीन्द्र नाथ अरोड़ा

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